----------- संतोष सारंग 

केंचुल











इस बरसात 

सांप ने फिर उतारा केंचुल 

मगर तुम कब उतारोगे 

सामंतवाद का केंचुल 

जातिवाद का केंचुल   

क्योंकि जहरीले जीवों को 

उतरना ही होता है अपना केंचुल

ताकि उसका अस्तित्व बचा रहे।


© संतोष सारंग