----------------------कविता © संतोष सारंग तुम भूख से तड़पते हुए मर जाओगे तो, मैं एक कालजयी कविता लिखूंगा तेरे पेट की पीड़ा को छंदों में पिरोऊंगा इस तर…
Read moreसंतोष सारंग की तीन बेतरतीब कविताएं
1. जिसे तुम कहते हो 'छोट जात' वह दिल से बड़ा है ईमान से कड़ा है नहीं है वह तुम्हारी तरह दिमागी रूप से इतना सड़ा। जिसे तुम कहते हो 'छोट ज…
Read more----------- संतोष सारंग इस बरसात सांप ने फिर उतारा केंचुल मगर तुम कब उतारोगे सामंतवाद का केंचुल जातिवाद का केंचुल क्योंकि जहरीले जीवों को उतरना …
Read moreदो ध्रुव
तू कबीर-रैदास को पूजो तो मैं तुलसी को पूजूं तू गौतम बुद्ध को पूजो तो मैं तेरे मनु को पूजूं तू आंबेडकर को पूजो तो मैं तेरे राम को पूजूं तू पेरियार को …
Read moreशहीद की परिभाषा
अब बदल जाएगी 'शहीद' की परिभाषा जो हाथों में ले लहराएगा अवैध पिस्टल सिस्टम और सरकार को ललकारेगा वर्दीधारियों को कॉलर पकड़ खींचेगा पुलिसवालों को …
Read moreचौकीदार चुप है
चोर ने मचाया था शोर, लगा के जोर कि मैं चौकीदार हूं इतना सुनना था कि लग गई लाइन चौकीदारों की पीएम चौकीदार सीएम चौकीदार एमपी चौकीदार एमएलए चौकीदार …
Read moreमैं क्यों पूजूं
--------------- © संतोष सारंग मैं क्यों जाऊं तुम्हारे मंदिरों में जहां अछूतों का प्रवेश वर्जित रहा जिसने स्त्रियों को बनाया देवदासी मैं क्यों पूजूं तेरे…
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