आजमैं भावनायों के सागर में डूबना चाहता हूँ. जीवन के कटु अनुभवों को दुनिया से बांटना चाहता हूँ ताकि अपनी नजर में और इश्वर की नजर में इमानदार रह सकूँ. मुझे यह सब पहले कह देना चाहिए था, लेकिन देर हो गयी. इसके लिए सबसे पहले आप सबसे क्षमा चाहूँगा. मैं पहले सोचता था कि जब मेरी अंतरात्मा कहती है कि तुम इमानदार हो तो फिर दुनिया के सामने क्यों सफाई देने जाँयू? अपनी ईमानदारी को साबित करने और अपने काम को सिद्ध करने के लिए दुनिया के सामने गिरगिराने से अच्छा है कि पूरे मनोयोग से रचनात्मक काम में लग जाओ. वक्त ही सबको जबाव दे देगा. यही सोच मैं अपने विरोधियों के तमाम आरोपों को झेलता हुआ सिर्फ अपने काम में लगा रहा, जिसका फल सामने है. अब  मैं अपनी बात रखता हूँ-
मेरा जन्म ५ अक्तूबर १९७३ को हुआ. मेरे पिताजी मिलिट्री में थे. दुर्भाग्य से १९७७ में उनकी सेवा के दौरान ही बीमारी से मृत्यु हो गयी. उस समय मेरी मैं साढ़े तीन साल का था. तीन बाई मैं दूसरे नंबर पर हूँ. एक छोटा भाई है. पिता की मृत्यु के बाद बहुत कष्ट से मां ने पढ़ाया. खेती-बाड़ी करके, सब्जी बेचकर अपनी पढ़ाई किया. उस समय मां को बहूत कम पेंशन मिलता था. समय गुजरता गया. और मंजिल को ओर मैं बढ़ता गया. १९९०-९३ सत्र मैं राज नारायण कॉलेज से भौतिकी मैं ऑनर्स प्रथम श्रेणी से किया. फिर मैं १९९४ में पत्रकारिता में कदम रखने लगा. मैं पत्रकारिता की शुरुआत बतौर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में किया. दैनिक हिन्दुस्तान, संध्या प्रहरी में छपना शुरू किया. इसी बीच १९९४ में ही मुम्बई से प्रकाशित आर्थिक साप्ताहिक 'अर्थ चेतना' के लिए बिहार से रिपोर्टिंग की. १९९६ में मैं दिल्ली का रुख किया. वहां 'टाईम पास' मंथली मैगजीन में संवाददाता के रूप में काम किया. फिर साप्ताहिक 'राष्ट्रीय राजधानी चक्र' में १५ सौ की सैलरी पर उप संपादक की नौकरी की. टाईम पास में मुफ्त में काम करता था. संघर्ष का दौर था, सो दिल्ली में ही अशोक विहार के पास जेजे कोलोनी में एक टेलीफोन बूथ में ७ सौ की नौकरी करना पड़ा. इधर बूथ में नौकरी भी करते थे और उधर दैनिक 'नवभारत टाईम्स' में लेख भी लिखता था. एक ५०० महिना पर ट्यूशन भी पढ़ाने लगा. दिल्ली में संघर्ष करते हुए टीवी ट्यूनर की एक छोटी फैकटरी में ४-५ महीने काम किया. ३-४ साल के दिल्ली प्रवास के दौरान एक ऐसा भी वक्त आया जब २-३ दिन भूखे रात गुजरना पड़ा. पूरे पैसे ख़त्म हो गए थे. दिल्ली के अंतिम दौर में मेरे साथ आजाद नगर में मधुबनी के 'अनिल रत्न', 'अमरनाथ झा', मेरा ममेरा भाई 'ऋषि राज' और एक साथी और रहता था. अमरनाथ झा अभी दैनिक जागरण, मुजफ्फरपुर में कार्यरत है. समय करवट लेता रहा. १९९७ में मेरी शादी हो गयी. दिल्ली की कमाई में पत्नी को वहां साथ रखना मुश्किल था, सो १९९८-९९ के आसपास दिल्ली छोड़कर मुजफ्फरपुर आ गया. सोचा यहाँ क्या करूँ ? विचार आया कि एक प्रिंटिंग प्रेस खोल दूँ रोजी-रोटी के लिए. वैसा ही हुआ. भगवानपुर चौक पर एक प्रिंटिंग प्रेस खोलकर स्वतंत्र पत्रकारिता करता रहा. १९९८ में ही जेडी यू (युवा) का जिला प्रवक्ता सह महासचिव बना. डॉ. हेम नारायण विश्वकर्मा जिला युवा के अध्यक्ष थे और धर्मेन्द्र सिंह धर्मा उपाध्यक्ष बनाये गए. एक साल तक राजनीति करने के बाद छोड़ दिया. महसूस हुआ कि राजनीति मेरे जैसे लोगों के लिए नहीं है.   
 वर्ष २००० के बाद का दौर : :
दिल्ली में पत्रकारिता करते हुए मैं सोचता था कि 
कलम से समाज और देश को अपना शत-प्रतिशत नहीं दे पायूँगा. इसी सोच का नतीजा था कि 'मिशन आई इंटरनॅशनल सर्विस' की स्थापना. अब मेरे जीवन का उद्दयेश हो गया बिहार के लिए कुछ करना, देश के लिए खुद को न्योछावर करना. इस हेतु मैं १ जनवरी २००० को दिल्ली के राजघाट से काठमांडू की पदयात्रा पर चल दिया. दुनिया में अमन-चैन और शान्ति का सन्देश देने के उद्देश के साथ. 'शहस्राब्दी विश्व शान्ति पदयात्रा' पर निकल परे. मेरे साथ यात्रा में ऋषि राज भी थे. वह कंपकंपा देने वाली ठंड में चलते हुए लोगों से मिलते हुए विचारों को शेयर करना एक गजब का अनुभव दे गया. २३ दिन की यात्रा के बाद लख्नऊउ पहुंचा और ऋषि राज के जिद्द पर यहीं यात्रा खत्म कर मुजफ्फरपुर लौट गए. दिल्ली लौटने के बाद हम दोनों को जौंडिस हो गया, जिसका अफ़सोस नहीं था. हाँ, एक अफ़सोस यह जरूर रह गया कि एक कमजोर साथी की वजह से काठमांडू तक हम नहीं जा सके. कर्म क्षेत्र में खुद को तपाते हुए जब समझ बढ़ी तो लगा कि मैं लोगों से एक झूठ बोलकर ठीक नहीं किया. सच्चाई से अपनी गलती स्वीकारते हुए कहना चाहता हूँ कि इस बात के लिए मैं खुद को कोसता रहा. और निरंतर गलती से सीख लेते हुए खुद को परिष्कृत करने की प्रक्रिया जारी रखी. यात्रा की इस सच्चाई को मैं दैनिक जागरण के साथ शेयर किया, जो प्रकाशित भी हुआ. खैर, २००० से अब तक समाज सेवा के क्षेत्र में मैं काफी उतार-चढ़ाव देखा.  (शेष अंश लिख रहा हूँ..)