पत्थर में प्राण

जब तुम  पत्थर में प्राण डाल सकते हो  मंत्रों से किसी को भस्म कर सकते हो श्राप से किसी को संकट में डाल सकते हो  तो मैं भी  एक मुट्ठी में धरती समा सकता हूं …

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अच्छे दिन आए

कौन कहता है कि  अच्छे दिन नहीं आए  अच्छे दिन बेखौफ आए धन्नासेठों, साहूकारों के लिए आए धर्म के ठेकेदारों के लिए आए अमीरों, जमींदारों के लिए आए लुटेरों, बंट…

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धरती का देवता

जब 'ब्राह्मण देवता की जय' हो सकता है, तो 'लोहार देवता की जय' क्यों नहीं? 'कुम्हार देवता की जय' क्यों नहीं? 'हजाम देवता की जय&#…

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तानाशाह का भ्रम

वह भ्रम में है कि झूठ जीत गया, सच हार गया हिंसा जीत गई, अहिंसा हार गई नफरत जीत गया, मोहब्बत हार गई कुतर्क जीत गया, तर्क हार गया मनुस्मृति जीत गई, संविधान …

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प्रकृति व प्रेम का अनंत विस्तार है शेफाली का 'गर्भ में चांद'

----------------------------------------------------------------   डाॅ संतोष सारंग कवि जब खुद कविता बन जाता है, तो वह शब्दों की अनथक यात्रा पर निकल पड़ता …

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मैं रोज सीखता हूं

मैं रोज सीखता हूं हरीतिमा आच्छादित बगियों से रंग औ' सुगंध बिखेरते गुलशन से आम्रमंजरियों पर मंडराते भ्रमर से निराशा-भरे जीवन में रंग भरना.  मैं रोज सीख…

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'कारक के चिन्ह' में विद्रोह करतीं कविताएं

----------------------------- डाॅ संतोष सारंग कवियों की भीड़ में एक मुकम्मल कवि होना असाध्य कर्म है। कवि बनने के लिए कविताई करना तो आसान है, मगर जनता के …

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